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मनुष्य साहित्य का लक्ष्य है और मनुष्य होने की शर्त है साहित्य। - डॉ सत्यनारायण व्यास

अपनी माटी की काव्य गोष्ठी 
किले में कविता
(औपचारिक हुए बगैर भी सार्थक होने की गुंजाईश)

'किले में कविता' अपनी माटी का यह ऐसा आयोजन है जिसमें किसी ऐतिहासिक दुर्ग या इमारत के आँगन/परिसर में बिना किसी औपचारिकता के पचड़े में पड़े कविता सुनना-सुनाना और कविता पर विमर्श किया जा सकता है। सार्थक होने के लिए किसी भी रूप में औपचारिक होना ज़रूरी नहीं है। लगातार औपचारिक हो रहे हमारे दैनंदिन जीवन में कुछ तो हार्दिक हो। एक विचार के अनुसार अतीत बोध के साथ कविता पर बात-विचार करने के इन अवसरों में यथायोग्य उसी परिसर में आखिर में श्रमदान करने की भी रस्म शामिल की गयी है। 

रिपोर्ट:मनुष्य होने की शर्त है साहित्य- डॉ सत्यनारायण व्यास
चित्तौड़गढ़ चार अगस्त,2013

घोर कविता विरोधी समय में कवि होना और लगातार जनपक्षधर कविता करना बड़ा मुश्किल काम है।वैसे मनुष्य साहित्य का लक्ष्य है और मनुष्य होने की शर्त है साहित्य। एक तरफ जहां आज व्यवस्था की दूषित काली घटाएँ तेज़ाब बरसा रही हैं वहीं जल बरसाने वाली घटाएँ तो कला और साहित्य की रचनाएँ ही हैं।तमाम मानवीय मूल्यों की गिरावट का माकूल जवाब है कला और साहित्य का सृजन।ये दोनों हमें अर्थकेन्द्रित और धन-पशु होने से बचाने वाली चीज़ें है। एक और ज़रूरी बात ये कि साहित्य और संस्कृति लगातार परिवर्तनशील धाराएँ हैं। अत: देश काल और समाज सापेक्ष नवाचार का हमेशा स्वागत करना चाहिए। वैज्ञानिक, तकनीकी और साइबर महाक्रान्ति के साथ कला और साहित्य को अपना तालमेल बैठाकर विकास करना होगा।

यह विचार साहित्य और संस्कृति की मासिक ई पत्रिका अपनी माटी के कविता केन्द्रित आयोजन किले में कविता के दौरान वरिष्ठ कवि डॉ सत्यनारायण व्यास ने कहे। चार अगस्त की शाम दुर्ग चित्तौड़ के जटाशंकर मंदिर परिसर में कवि शिव मृदुल की अध्यक्षता में आयोजित काव्य गोष्ठी में जिले के लगभग सत्रह कवियों ने पाठ किया। शुरू में आपसी परिचय की रस्म हुई। आगाज़ गीतकार रमेश शर्मा के गीत घर का पता और तू कहती थी ना माँ सरीखे परिचित गीतों से हुआ। प्रगतिशील कविता के नाम पर विपुल शुक्ला की कविता लड़कियाँ और हम मरे बहुत सराही गई।इस अवसर पर कौटिल्य भट्ट ने दो मुक्कमल गज़लें कहकर हमारे आसपास के ही वे दृश्य पैदा किए जो हम अक्सर नज़रअंदाज कर जाते हैं।सालों से लिख रहे रचनाकारों में जिन्होंने पहली मर्तबा सार्वजनिक रूप से पाठ किया उनमें किरण आचार्य का गीत बादलों पर हो सवार और माँ शीर्षक से प्रस्तुत रचनाएं और मुन्ना लाल डाकोत की पद्मिनी मेल रो भाटो ने ध्यान खींचा। राजस्थानी रचनाओं में नंदकिशोर निर्झर,नाथूराम पूरबिया के गीतों से माहौल खूब जमा। 

जहां सत्यनारायण व्यास ने मेट्रो शहरों के जीवन पर केन्द्रित कविता फुरसत नहीं और ईगो के ज़रिए व्यंग्य कसे वहीं उनकी कविता माँ का आँचल ने अतीत बोध की झलक के साथ संवेदनाओं के लेवल पर सभी को रोमांचित कर दिया। इसी संगोष्ठी में आकाशवाणी चित्तौड़ के कार्यक्रम अधिकारी योगेश कानवा ने अपनी स्त्री विमर्श से भरी हाल की लम्बी कविता का पाठ किया। डॉ रमेश मयंक ने अपनी जल चिंतन रचना से किसी एक शहर के बीच नदी के अस्तित्व को उकेरते हुए जीवन के कई पक्ष हमारे सामने रखे।जानेमाने गीतकार अब्दुल ज़ब्बार ने अपनी परिचित शैली में चंद शेर पढने के बाद अपना पुराना गीत मौड़ सकता है तू ज़िंदगी के चलन  ने एक  बार फिर छंदप्रधान रचनाओं का महत्व जता दिया। संगोष्ठी के सूत्रधार अध्यापक माणिक ने गुरूघंटाल नामक कविता सुनाकर तथाकथित बाबा-तुम्बाओं की दोगली जीवन शैली पर कटाक्ष किया। वहीं शेखर चंगेरिया, विपिन कुमार, मुरलीधर भट्ट, भगवती बाबू और भरत व्यास ने भी कविता पाठ किया। आखिर में शिव मृदुल ने शिव वंदना प्रस्तुत की। 

संगोष्ठी में बतौर समीक्षक डॉ राजेश चौधरी, डॉ रेणु व्यास, डॉ राजेंद्र सिंघवी, डॉ अखिलेश चाष्टा और महेश तिवारी मौजूद थे।आकाशवाणी से जुड़े स्नेहा शर्मा, महेंद्र सिंह राजावत और पूरण रंगास्वामी सहित नंदिनी सोनी, चंद्रकांता व्यास, सुमित्रा चौधरी, सतीश आचार्य और कृष्णा सिन्हा ने भी अंश ग्रहण किया।श्रमदान के साथ ही गोष्ठी संपन्न हुई। 

रिपोर्ट-माणिक,चित्तौड़गढ़

फ्रेंड्स ऑफ़ फोर्ट चित्तौड़ के आयोजन की रिपोर्ट


दुर्भाग्य यह है कि हमारी पीढ़ी  के पास देश के लिए कोई सपना नहीं है-डॉ रेणु व्यास

डॉ रेणु व्यास
हमें ये नहीं भूलना नहीं चाहिए कि आज हम जिस गणतांत्रिक भारत में रहते है वो हमारे ही पुरखों के लम्बे संघर्ष का सुखद परिणाम है। इस वैश्विक समय में अपने ही संविधान की प्रस्तावना को शब्दश सच करने का लंबा रास्ता और उद्देश्य एक बड़ी जिम्मेदारी की तरह हमारे सामने है। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ से शुरू जनजागरण से लेकर देश की आज़ादी तक का अपना पहला संघर्ष पूरा हुआ मगर बीते चौसंठ सालों में भी हम अपनी बहुत सी व्याधियों से लड़ते रहे हैं। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, सामाजिक-आर्थिक गैर बराबरी की दीवारे कमोबेश रूप में आज भी हमारे सामने अखंड खड़ी हैं। अफसोस इस नितांत व्यक्ति केन्द्रित समय में हमारी युवा पीढ़ी के पास स्वतन्त्रता सेनानियों की तरह कोई राष्ट्रीय सपना नहीं है। फिर भी हमें इस तंत्र में आमजन के हस्तक्षेप को ज्यादा मजबूत बनाने की तरफ सोचना होगा।

डॉ सत्यनारायण व्यास 
हमें गर्व होना चाहिए कि  हमने अपने ढ़ंग  से अपने राष्ट्र की परिभाषा दी है। जहां भारत में राष्ट्र का अर्थ कोई भौगोलिक सीमा से नहीं होकर समस्त मानव समाज  से है और समाज भी ऐसा जहां जाति ,नस्ल, धर्म जैसी संकीर्णता से हम परे हैं। हमारी ये परिभाषा उन यूरोपीय देशों से कई ज्यादा अच्छी है जो बहुत संकड़ी मानसिकता के कारण बाद में आगे नहीं बढ़ सके। गणतंत्र का अर्थ हमारे लिए दासता और उपनिवेशवाद से मुक्ति था  जिसके सही मायने हमें मालुम होने चाहिए। हमारे देश में संविधान की संप्रभुता हमारी जनता से है। चूँकि हम सभी में से अधिकाँश का जन्म आज़ाद भारत में हुआ है इसलिए हम संघर्ष का सही अंदाजा नहीं लगा पाए हैं। हम देश की आज़ादी के साथ मिली उपलब्धियों का असल मोल हम समझ ही नहीं पाए हैं।


ये विचार नगर की युवा विचारक डॉ रेणु व्यास ने फ्रेंड्स ऑफ़ फोर्ट चित्तौड़ जैसे अनौपचारिक समूह द्वारा चित्तौड़ दुर्ग पर स्थित विजय स्तम्भ परिसर में आयोजित एक संगोष्ठी में व्यक्त किये। 26 जनवरी के उत्सवी माहौल में सवेरे सवा ग्यारह बजे शुरुआत यहाँ में हिंदी कवि और समालोचक डॉ सत्यनारायण व्यास सहित पचास से भी अधिक नागरिकों द्वारा झंड़ारोहण किया गया। डॉ व्यास ने ऐसे कार्यक्रम दुर्ग जैसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर केन्द्रित कर उन्हें आमजन के नेतृत्व में पूरे किये जाने की महती ज़रूरत व्यक्त की। संयोजक पवन पटवारी के अनुसार जानेमाने गीतकार अब्दुल ज़ब्बार ने राष्ट्र स्तुति में गीत पढ़े। 

डॉ राजेन्द्र सिंघवी 

इस मौके पर कोलेज के हिन्दी प्राध्यापक डॉ राजेन्द्र कुमार सिंघवी ने कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव लोकतांत्रिक रही है। विदेशी दासता के क्षणों में भी हमने अपने मूल सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक स्वरुप को सदैव बनाए रखा है उसी का परिणाम है कि  हम तब भी उच्च कोटि के वैचारिक साहित्य की रचना कर सके। समय के साथ इस लोकतंत्र को ज्यादा परिपक्व बनाए जाने की आवश्यकता है अन्यथा इसके भीड़तंत्र में तब्दील हो जाने की पूरी आशंका है। संगोष्ठी को भूमि विकास बैंक अध्यक्ष अनिल सिसोदिया और भास्कर ब्यूरो प्रमुख राकेश पटवारी ने संबोधित करते हुए कहा कि ये आयोजन ज्यादा सशक्त संस्थागत स्वरुप में आगे बढ़े और इसे दुर्ग से जुड़े दूसरे ज़रूरी पहलुओं पर भी  केन्द्रित कार्यक्रम करने चाहिए। 


गीतकार अब्दुल ज़ब्बार 
कुछ फ्रांसीसी पर्यटकों सहित फोटोग्राफर वेलफेयर सोसायटी के के के शर्मा,  गोपाल शर्मा, जायंट्स ग्रुप के  जगदीश चन्द्र चौखड़ा, चित्तौड़गढ़ अरबन को-ओपरेटिव बैंक के आई एम् सेठिया,  मनसुख पटवारी, वंदना वजिरानी, अमन फाउंडेशन के रामेश्वर लाल पंडया, अपनी माटी के डॉ राजेश चौधरी, कौटिल्य भट्ट, चन्द्रकान्ता व्यास, नंदिनी सोनी, दिनेश सांचोरा, दुर्ग विकास संस्थान के गौतम भड़कत्या  सहित  चित्तौड़ चेतक, जेसीस क्लब की सहभागिता से आयोजन हुआ। समापन कृष्णा सिन्हा के कविता पाठ और जगदीश चन्द्र चौखड़ा द्वारा आभार के साथ हुआ। संगोष्ठी के सूत्रधार संस्कृतिकर्मी माणिक थे। 

पवन पटवारी
आयोजन समन्वयक 
फ्रेंड्स ऑफ़ फोर्ट चित्तौड़ अनौपचारिक समूह

बाकी छायाचित्र 



संचालन करते माणिक 

शुरू में समूह फोटो 

आखिर में समूह का फोटो 



सीता ही बार बार अग्नि परीक्षा क्यों दे ? डॉ सत्यनारायण व्यास

अपनी माटी / चित्तौड़गढ़ समूह का आयोजन 

डॉ सत्यनारायण व्यास
समकालीन परिदृश्य में देश में जिस तरह के हालात है,कहीं न कहीं हमारी मानसिकता प्रश्नों के घेरे में हैं।पुरुष वर्चस्व वाले इस समाज को अपने ढाँचे के बारे में फिर से चिंतन करना चाहिए।यहाँ हमारी रुढ़िवादी परम्पराओं में सीता ही अग्नि परीक्षा दे यह कहाँ का न्याय है।चारित्रिक पतन के सवाल के घेरे में हम सभी हैं।सभी तरह के वादों से ऊपर उठते हुए हमें मानवतावाद का पक्षधर होना होगा।तभी हमारे इंसान होने का सही फ़र्ज़ हम पूरा कर पायेंगे।कविता,कहानी आदि का शगल और साहित्य जीवन के लिए साधन मात्र है साध्य नहीं।जीवन ही सर्वोपरी है।साहित्य और दर्शन हमें सही मायने में जीना सिखाते हैं।

यह विचार कवि गोष्ठी की शुरुआत में हिन्दी समालोचक और कवि डॉ सत्यनारायण व्यास ने व्यक्त किये। अपनी माटी वेबपत्रिका के चित्तौड़गढ़ समूह से जुड़े साथियों द्वारा तीन जनवरी शाम एक कवि गोष्ठी का आयोजन सैंथी में किया गया।बिना किसी औपचारिकता के इस गोष्ठी में लोककलाविद चन्द्रकान्ता व्यास ने सरस्वती वन्दना के मार्फ़त गुरु शंकराचार्य के द्वारा देवी के आव्हान को शब्द दिए।वहीं संस्कृतिकर्मी माणिक ने अपनी दो कविताओं के ज़रिये हमारे बदलते हुए सामाजिक परिवेश में पीछे छूटते हुए मूल्यों का बखान किया।समय के साथ ख़त्म होते सनातन प्रतिमान के प्रति चिंता जाहिर की।अब कोई आवाज़ नहीं देता पड़ौसी  को , नहीं याद आता दूजा पड़ौसी जैसी शीर्षक वाली रचना के साथ ही आँगन आकाशवाणी का जैसी बिम्ब प्रधान कविता सुनाई।प्राकृतिक बिम्बों के मानवीयकरण के लिहाज से रचना सराही गयी।

आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी,कवि और युवा कहानीकार योगेश कानवा ने तीन कवितायेँ पढ़ी जिनमें इस दौर में आदमी के बहुत नीचे तक जाकर गिरने और मानव मूल्यों को ताक में रखकर जीने की कला जैसे विषय को अपना आधार बनाया।पुलिस व्यवस्था और सेल संस्कृति को भी उन्होंने अपना निशाना बनाया।कोलेज में हिन्दी प्राध्यापक डॉ राजेन्द्र कुमार सिंघवी ने रामायण और महाभारत के अंशों से उदाहरण लेते हुए 
तीन मुक्तक गाकर सुनाये।और कहा कि हमारे हिन्दी साहित्य के इतिहास में अफ़सोस इस बात का है कि गीत,ग़ज़ल की परम्परा को सही मायने में अंकित नहीं किया गया।

अंत में डॉ सत्यनारायण व्यास ने अपनी हाल में खासी चर्चित प्रबंध रचना सीता की अग्नि परीक्षा के शुरुआती पद सुनाये।निराला की राम की शक्ति पूजा के उतरार्ध के रूप में लिखी इस लम्बी कविता के बहाने डॉ व्यास ने हमारे समाज में महिलाओं के प्रति पुरुषों के दोगले चरित्र को उजागर किया है।साथ ही उन्होंने इस संक्रमण के काल में बचे हुए सुख की तरफ इशारा करती एक छन्दमुक्त कविता भी सुनायी।

गोष्ठी के अंत में हिन्दी व्याख्याता डॉ कनक जैन, कोलेज प्राध्यापक डॉ राजेश चौधरी  ने सुनायी गयी कविताओं के बारे में विस्तार से अपने विचार रखकर विमर्श किया। केन्द्रीय साहित्य अकादेमी द्वारा चंद्रकांत देवताले जैसे वरिष्ठ कवि को अकादेमी सम्मान दिए जाने पर खुशी ज़ाहिर की। आयोजन को अतिथि, संचालन, स्वागत और आभार जैसी औपचारिकता से दूर रखा गया।