(ये कविता,लोकप्रिय कविता 'राम की शक्ति पूजा' के उत्तरार्ध के रूप में लिखी गयी है. देश की प्रखर साहित्यिक पत्रिका बनास जन के हाल के अंक में 73 पेज संख्या पर ये कविता छपी है.इस पत्रिका का ये अंक भी बाकी अंकों की तरह संग्रहणीय बन पडा है. तमाम बड़े लेखकों के साथ ही युवा रचनाकारों की रचनाएं शामिल है .खासकर कविताओं का भी समावेश इस अंक में किया गया है।284 पेज के लगभग की सामग्री से ये अंक भी पुस्तकाकार बन पड़ा है।।पत्रिका मंगवाने हेतु यहाँ क्लिक कर जानकारी ले सकते हैं।हमारे इंटरनेट के पाठकों के लिए इसे यहाँ बनास जन से ही साभार छाप रहे हैं.
सीता की अग्नि-परीक्षा
तम हुआ ध्वस्त। प्राची-मरीचि विजयान्त छन्द
लिखती-लंका-कंकाल-काव्य-रचना-प्रबन्ध-
प्रतिसर्ग-खड्ग-दशग्रीव-ग्रीव-शर-गुच्छ-ग्रास
रत्नाकर-रक्ताकुल-बाड़व-हर-तृषा-त्रास -
कोणपदल-खल-झष-झुण्ड-विकल आकंठ-प्राण
बिंध अंतिम संगर-विशिख-दंश विषज्वलित शाण
नर्तित कबन्ध-प्रतिसन्ध-सुभट-नट-मीचि-रंग
क्रीड़ित-कृतान्त-भस्मान्त-क्रान्त-उत्संग व्यंग।
रण-रंग राम अवतरणपूर्व निज चिकुर श्याम
बांधते सुदृढ़ कर-उभय अभय मन आप्तकाम -
‘ओ रावण कारण-समरमूल आ गया अन्त
सब पाप-ताप-अपराध व्याध तेरे अनन्त
अब हुए ध्वस्त समझो, संभलो पंडित प्रकांड
यह दंड-दिवस, हो चुका बहुत तांडव अकांड
ओ ऋषि-मुनियों के रुधिर-भाण्ड, ब्रह्माण्ड-कलुष
कर प्राण-हरण समरांगण में यह शार्ङ धनुष -
लेगा विराम, विश्राम करेगा निखिल जगत
फिर से सुस्थापित होंगे जग-नय-नीति स्वगत।’-
कह रघुवर उठ हो गए खड़े, निज उत्तरीय
को बांध लिया कटि पर कस कर, कर में स्वकीय -
ले महाधनुष, तूणीर पृष्ठ पर बांध, सकल
शर दिव्य भर लिए तीक्ष्ण गरलमय व्याल विकल।
तूणीर पूर्ण, हो गया रिक्त रावण-जीवन
वरदान शक्ति का पा रघुवर आश्वस्त प्रमन
तज शिविर चले ज्यों सिंह कंदरा से बाहर
आता, आए संकल्प-भाव मुख पर सुंदर।
प्रमुदित लक्ष्मण दाहिनी ओर, कपिवर पीछे
ले गदा भयंकर स्कंध पूंछ ऊंची, नीचे
हिल रही धरा, लहराते फर-फर ध्वज अनेक
चल पड़े रणोद्यत योद्धा बढ़कर एक-एक -
सुग्रीवांगद जांबवान हर धूम्र दंभ
सन्नादन क्रथन प्रमति केसरि कपि दबंग
शतबलि के संग संपाति प्रमति ये यूथ-राज
गजराज-सहस-बलधर युद्धोत्सुक कपि-समाज।
इनमें विशिष्ट अनुजारि विभीषण संग धीर
अपने भविष्य को राम-वदन तकते अधीर
वानरपति भी कुछ अन्य नील, नल, मैन्द, कीश
दधिमुख, दुर्मुख, गज, गवय ऋक्ष-संग थे कपीश।
वह महासैन्य एकत्र, रचा फिर गरुड़-व्यूह
तन रहा खड़ा सन्नद्ध महारव सतत हूह
रघुवर लक्ष्मण के साथ स्वयं उत्तर में स्थित
दक्षिण में अंगद वानरेन्द्र बलशील अमित
सन्नद्ध नील दिशि पूर्व सूर्य के ही समान
पश्चिम थे महाप्रतापी कपिवर हनूमान।
पीछे सुवेल पर्वत रघुपति का सैन्य-शिविर
दे रहा विदा, छा रही ज्योति, हट रहा तिमिर।
कम नहीं उधर दशकंठ असुर-रण-आयोजन
विस्तीर्ण उच्छलित महाकटक शत-शत योजन
अरि-सैन्य-व्यूह के पूर्व द्वार पर था प्रहस्त
पश्चिम दिशि में था मेघनाद अरि खड्गहस्त
दक्षिण में महापार्श्व और प्राची शुक-सारण
दस हज़ार रथ, बीस सहस हय, अगणित वारण
कोटिसंख्य सैनिक पदाति रणकुशल वीर
थी महाकटक रावण की लड़ने को अधीर।
ध्वजशोभित रथ, हींसते अश्व, गज की चिंघाड़
कवचों की कड़ियां खन-खन, शूरों की दहाड़
कर में सब कोदंड, खड्ग शस्त्रास्त्र धरे
तूणीर पृष्ठ पर कसे बाण बहुभांति भरे।
रावण-सेना के पास शस्त्र नाना प्रकार
असि, शूल, गदा, पट्टिश, त्रिशूल अति तीक्ष्णधार
थे इधर वानरी सेना के कर शिला, उपल,
तरुवर समूल निज भुजा-युगल में लिए विपुल
किट-किट ध्वनि से कर रोष दिखाते तीक्ष्ण दन्त
ठोकते ताल विकराल काल असुरारि-अन्त।
स्यंदनासीन ज्यों अपर भानु रावण ऊपर
चल कुंडलास्य आरक्त नयन लखता भू पर -
नव रण-प्रबंध अपना, अरि का अवलोक रहा
दश दिशि में शासन दशकिरीट का डोल रहा
वह बल-निधान वरदानप्राप्त रण में अजेय
स्वामित्व सदा जिसका त्रिलोक में नित्य गेय
सुर-असुर, यक्ष, गन्धर्व, नाग सब जाति विजित
रथ पर सधूम ज्यों अनलदेव हों रण में स्थित
पौलस्त्य पापघट, जग-कंटक, धन-बल-कुबेर
अन्याय-मूल को दिव्य-शक्ति क्यों रही घेर ?
समरांबुधि का वह महामत्स्य, लंका-कलंक
अशकुनक सा वह धूमकेतु नभ में अशंक
मन ही मन वह मंदोदरि की सोचता सीख
कह रही रात, जो जीवन की मांगती भीख -
‘‘सन्धि करो हे नाथ युद्ध में जीत असंभव
लौटा दो सीता को कर लो रक्षित वैभव,
ये भुज, दस शिर, यह वक्षस्थल, मेरे सुहाग
चिरकाल रहें रक्षक मेरे, फूटें न भाग
है विनय यही दासी की, धन, वपु नहीं अमर
पर पक्ष आपका अनुचित, मंगल नहीं समर
अपशकुन हो रहे मुझको, गर्दभ रहे रेंक
कल श्रीमुख को विद्रूप सकूंगी नहीं देख।’’
‘परवाह नहीं, क्या डरता हूँ मैं विश्वजीत
महिलाएंँ तो होतीं स्वभाव से सदा भीत
मैं प्रतिश्रुत हूँ अब समर लडूंगा यह अवश्य
स्वीकार मुझे जो होगा लंका का भविष्य।’
हैं खड़े राम, पदत्राण-रहित बस धरती पर
निष्कवच किन्तु है दिव्य तेज अरुणिम मुख पर
नवरात्रि-साधना अक्षय वर दुर्गा-प्रदत्त
है आज शरासन अप्रतिहत राघव प्रमत्त
सुरपति ने भेजा मातलि संग निज स्वर्ण-सुरथ
हो मृत्युवाह रावण का मानो दिव्य प्रमथ,
बज उठे शंख तब ढोल, पटह नक्कार व्योम
बहु अट्टहास-रव महाकाश हिल उठें रोम
लंकेश उठे रथ में कराल, भय को बिसार
संकेत सैन्य को किया उभय निज भुज पसार -
‘‘बढ़ कर आगे अब करो आक्रमण शूर बढ़ो
अक्षय राक्षस-कुल-कीर्ति-वृद्धि के छन्द पढ़ो
यह भूखा-प्यासा भीरु राम वन-निर्वासित
ये बंदर अंकुशहीन सदा जग में हासित
टिक सकें न पल भर, एक जोर की दो हुंकार
नर-वानर बेचारे डरते अहि की फुंकार’’ -
कह रावण ने निज गदा, शूल, धनु लिए हाथ
सारथि रथ को ले बढ़ा सैन्य के साथ-साथ,
संभले रघुवर, हो सावधान गुण चढ़ा धनुष
आकर्ण खींच प्रत्यंचा हरने विश्व-कलुष
छोड़ा झट गान्धर्वास्त्र विमूर्च्छित हुए असुर
देखते चतुर्दिक राम सहस्रों मोहित उर
अपशकुन हुए रावण के बांए अंग स्फुरित
रथ पर आ बैठा गिद्ध, चित्त में भय अंकुरित
रो रहीं शिवा, भौंकते श्वान, उल्का गिरतीं
यों लगा मृत्यु रावण की आस-पास फिरती,
तब पड़ीं टूट सेनाएं दोनों ओर अन्ध
सिर उड़े, कटे भुज, फटे वर्म, नचते कबन्ध
भू हुई लाल, नर-असुर-रुधिर बह चला घोर
सत् असत् सतत संघर्ष, समर-चंडी विभोर
लक्ष्मण थे विद्युत की गति से छोड़ते बाण
वह मेघनाद पा नहीं रहा था प्राण-त्राण
ले ब्रह्म-शक्ति, पढ़ मंत्र छोड़ दी लक्ष्मण पर -
क्षणभर में ही सौमित्र गिरे मूर्छित भू पर
झट राम दौड़ कर आए, प्रिय को लिया अंक
पर देवी का वरदान विजय-हित, मन सशंक -
‘‘यदि भाई को खोकर ही यों मिल सके विजय
धिक्कार मुझे, मेरे बल को यह केवल क्षय!
भ्राता लक्ष्मण! प्रिय उठो तात! यह काल विकट
छोड़ो मूर्छा, लो धरो चाप, कर शौर्य प्रकट।’’
रो रहे राम, हनुमान ला धरी संजीवन
विद्युत-प्रभाव से आंख खोल उठ गए लखन।
होता आया जाने कब से यह मूल्य-युद्ध
क्यों सृष्टि हमेशा द्वन्द्वग्रस्त शुभ-अशुभ-रुद्ध
क्यों यह प्रवृत्तिगत भेद, धरा का शाप नित्य ?
क्यों लड़ते-भिड़ते धर्म-नीति-हित नर अनित्य ?
घनघोर मचा संग्राम, सभी थे क्षण-भंगुर
सिर, भुजा, जंघ तैरते रक्त में स्पंदित उर
राम ने एक अंतिम अचूक तब लिया बाण
साधा धनु पर, फिर लिया खींच पर्यन्त कान
वह था रावण का काल, नाभि का अमृत लक्ष्य
था अनल-ज्वाल विषधर सजिह्व-लंकेश भक्ष्य
शर लगा, जगा सीता-सुहाग, असुरेश विकल -
हो गिरा धरा पर महाकाय अघभार सकल
दस दिक हर्षित नर्तित सुर-वानर-नर समस्त
समरान्त सफल-शुभ, हुआ असुर-कुल-भानु अस्त।
बरसे नभ से शुचि सुमन ‘राम की जय, जय, जय!
अति दीर्घ अवधि के बाद धरा फिर हुई, अभय’
प्रमुदित हो, नचते, खड़े राम को घेर सकल
दृग से सबको कर धन्य राम ने कहा अमल -
‘‘लक्ष्मण, हनुमत, सुग्रीव आदि वीरो आओ,
अब समय, हमें तापसी प्रिया तक पहुंचाओ।’’
तब मूर्तिमती वैराग्य वहाँ पर वैदेही
सादर थीं लाई गईं, सिमटती निज में ही
सकुचाती, रोती रुद्धकंठ, कर जोड़ प्रणत
स्वामी के आगे मूक विकल सिर झुका विनत
नारी हारी क्यों जबकि पुरुष की प्रिया रही
आकाश-दंभ नर से क्यों दबती रही मही ?
ओ राम राम, पुरुषोत्तम मर्यादा-निकेत
बरसों अशोक-वन तपीं आपकी सुधि-समेत
चुप क्यों हो पुरुष-प्रवर, बंधन क्यों राजधर्म ?
बोलो, सीता क्या करे ? चित्त का कहो मर्म
खोलो अपने मन के कपाट - करणीय कार्य
यह विरहिन कंपती खड़ी आपकी प्रिया आर्य!
तब बोले प्रभु अप्रत्याशित वाणी कठोर
कर वज्रपात निकले मुख से ये शब्द घोर -
‘‘सीते ! न तुम्हें अब कर सकता मैं अंगीकृत
तुम रही परपुरुष के संरक्षण में विकृत
होगा अब संग तुम्हें रखना धिक्कार-मान
संसार पड़ा, तुम जा सकती हो, जहाँ स्थान -
मिल जाय तुम्हें अनुकूल, रहो अब मुझे भूल
अस्तित्व तुम्हारा हुआ हमारे लिए धूल!’’
निष्प्राण भूमिजा सुनती प्रभु की क्षुरित वाक्
हो गई स्तब्ध हतप्रभ आंसू से भर अवाक्
‘‘प्रियतम! स्वामी! हो नाथ आप क्या वही राम ?
मैं भूखी-प्यासी रोती लेती रही नाम -
आपका, आपकी हूँ, कैसे यों ठुकराते ?
यह कैसा राजधर्म, त्याग यह किस नाते ??
सीते, तुमको क्या मिला ? जन्म धिक् धिक् नारी
पद-पद पर हो पद-दलित पुरुष से नित हारी
माता, पत्नी, भगिनी, पुत्री - नर की न सगी ?
होमा अपने को सदा, किन्तु तुम गई ठगी!
क्यों पुरुष-क्रीड़नक बनी, स्वयंवर जीत राम
लाए, फिर लंकेश ले गया खल स्वधाम -
छल से, बल से, तब पुनः हुआ परिणाम युद्ध
अपने इस रूप-शत्रु पर हूँ मैं आज क्रुद्ध!
सौन्दर्य सुकोमल नारी का ही आत्मघात
कामुक उलूक पुरुषों का वह मानो प्रभात
लंपट-समूह प्रतियोगी-दल की वह कंदुक
मेमना एक, हैं खड़े चतुर्दिक खल जंबुक
मेरी क्या त्रुटि थी, कहो नाथ-नारी होना ?
अपना कहने को कहीं सृष्टि में है कोना ?
अपराध, न्याय, आरोप सभी तय करें पुरुष
पुरुषों से पूछे कौन कि जिनमें भरा कलुष ?
सत्ता, क्षमता, आदेश, दंड - सब नर के कर
निर्जीव वस्तु हम, जीत डाल ली घर-पिंजर
सब नीति-नियम-निर्देश थोप बेचारी पर
नर मुक्त स्वयं, शंकालु-नयन बस नारी पर!
क्या यही कहाता राम-राज्य पुरुषैकवन्त ?
धिक्कार अयोध्या-शासन-सिंहासन दुरन्त!
जिस शक्ति-साधना से जीता यह दुर्गम रण
था नारी का ही दिव्य रूप, कुछ हुआ स्मरण ?
मैं रही आपके बिना, नहीं क्या रहे आप ?
फिर क्यों चरित्र की शंका मुझ पर तनी शाप ?
समझी, सत्ता-शासन का एकल पुरुष केन्द्र
यह जंगलराज सरासर इसका नर मृगेन्द्र!
मुझको देनी पड़ रही सफाई बिना दोष
गुण, शील, सदाचारों को केवल पुरुष कोष ?
क्या न्याय-व्यवस्था ? केवल केवल पक्षपात!
स्वीकार नहीं यह मुझे न्याय विकलांग नाथ!!’’
करती विलाप, पल्लू से आंसू पौछ रही
थे राम हृदय-पाषाण, सिसकती मौन मही
था अटल राज का धर्म - सजाई गई चिता
सीता दे अग्नि-परीक्षा सिद्ध करे शुचिता!
हर नारी के क्यों भाग्य लिखी यह अग्नि-चिता ?
क्यों दूध-धुला हर पुरुष, कहाँ उसकी शुचिता ?
पूछे कोई, पर कहाँ, किसे, कब सुने कौन ?
रो रही अयोध्या की रानी, सब खड़े मौन!
सब मौन वृक्ष, पशु-पक्षी, वानर, नर, नरेन्द्र
लक्ष्मण भी चुप, थे जांबवान् चुप दानवेन्द्र,
चुप खड़ी शीश को लटकाए राघव-सेना
यह प्रकरण है नारी का, किसको क्या लेना ?
धिक्कार, पुरुष तेरी सत्ता यह धौंस भरी
तू रहा ज़िन्दगी भर को नारी का प्रहरी!
रे गया भूल, वह जन्मदायिनी भी तेरी
प्यारी गृहिणी, वह अंकशायिनी है तेरी!
पुत्री वह स्वसा, सर्वमंगला, शुभ चिंतनिका
बल के मद में तू अहंकार के हाथ बिका
तूने सत्ता के भ्रम में नारी को कुचला
सीता की मां चुप, देख सिसकती है अचला!
देवी दुर्गा, लक्ष्मी, कमला कह शक्ति जिसे
पूजा था प्रभु ने विजय हेतु, वह भक्ति किसे -
अर्पित की ? है वही शक्ति यह सीता भी
तुम अहंकारवश हार गए रण जीता भी!
फिर भी सीता ने किया शांत अग्नि-प्रवेश
साक्षी थे धरती के पुंगव कौशल-नरेश!
तब हुए प्रकट सीता को संग ले अग्निदेव -
सशपथ बोले - ‘‘सीता विशुद्ध है एकमेव!
स्वीकार करें अब इसे देव! प्रस्थान-पूर्व
यह कठिन परीक्षा नारी की जग में अपूर्व
नारी का अग्निस्नान नियति, नर जन्म-शुद्ध
अबला वह कोमल चंद्रकला प्रतिपल अशुद्ध ?’’
तब ले आए लंकेश अनुज पुष्पक विमान
रावण के वैभव का प्रतीक वह मूर्तिमान
सीता-कर कोमल थाम, हुए आसीन राम
ओ मित्र विभीषण! रखना यह लंका स्वधाम।
देखते, दिखाते नभ से भू के विविध स्थान
रघुवर पहुंचे, कौशल नगरी हर्षित अमान
स्वागत में तोरण स्वर्ण-खचित, पुरजन समाज
कर-बद्ध खड़े जय जय उचार ‘हम धन्य आज’!
दिन बीत गए कुछ, राम हुए सिंहासनस्थ
आत्मीय भद्र के समाचार से हुए त्रस्त -
‘‘प्रभु! रजक एक पत्नी को निशि में रहा मार,
कहता - जा निकल, निकल घर से कर पद-प्रहार!
मैं नहीं राम जो रख लूं तुझको तज कलंक
तू कहाँ घूमती रही, यहाँ लौटी अशंक!’’
थी सभा स्तब्ध, रुक गई सांस, निस्तब्ध भवन
आनंद निकेतन हुआ पलक में शोक-सदन!
सब ताक रहे मुख राघवेन्द्र का शंकित-मन
अब क्या होगा ? क्या निर्णय लेंगे शत्रुदमन ?
गंभीर राम, सह वज्रपात को अन्तस्तल
बोले तब, ‘‘लक्ष्मण अनुज! उठो कर मन निश्चल
अपनी भाभी सीता को रथ पर तुम सवार -
कर वन में आओ छोड़ कहीं यह दुर्निवार -
आज्ञा मेरी, हो अभी पालना इसी समय
परिणाम रहेगा जो भी मुझ पर छोड़ अभय!’’
यह गई सूचना अंतःपुर, सीता समोद
दासी सखियों के मध्य कर रही थी प्रमोद
सुन रही सन्न, पल में विपन्न होकर अचेत
‘‘मेरा अभाग्य क्या शत्रु बना मानो परेत!
सौभाग्य कहूँ दुर्भाग्य प्राणपति कहो आप ?
प्रियतम हो, अप्रिय दंड, हुआ वरदान शाप!
जो अग्नि-परीक्षा हुई अभी, वह गरम राख
स्वामी से वन में विलग, वृक्ष की कटी शाख -
कैसे मैं कहाँ रहूंगी दोहद को संभाल ?
हे ईश्वर! रानी बना किया पल में कंगाल!
ओ सीते!नारी! पुरुष-पुरी, ये वधिक-वृंद -
ममता न दया, माया, करुणा सब स्वार्थ-अंध!
अभिमान-मेरु, पाषाण-हृदय, गत-संवेदन
करते निरस्त नारी के अश्रुल आवेदन!
ठुकराते पल में प्यार, भुला कमनीय-केलि
पल हरसिंगार कहते, पल में ही गरल-बेलि!!
विश्वासघात पर्याय पुरुष का निःसंदेह!
है देख लिया जीवन में, नर में नहीं स्नेह
वह नग्न स्वार्थ का पुंज, दंभ का दूत निपट
अधिनायक, सच्चा नहीं हृदय का, क्रूर कपट!!’’
रोती थी, महलों की दीवारें खड़ी मौन
वह क्रंदन सखियां ही सुनतीं, नर सुने कौन ?
रथ सजा, जानकी को लक्ष्मण ले चले धीर
सोचते हृदय में भ्राता का अन्याय, वीर
बोले - ‘‘माता! यह आश्रम है रहने सुयोग्य
मैं विवश, चलूं आदेश-बंधा हूं क्षमायोग्य।’’
वाल्मीकि हो गए धन्य, सुता मिल गई एक!
संध्या-वंदन, जप-ध्यान-योग सब दिए फेंक!
जन्मे लव-कुश प्रतिमूर्ति राम की वे सुंदर
बल, रूप, गुणों का कोष लिए अपने अंदर
संग ऋषिवर के, ले वीणा कर में उभय बाल -
जा पहुंचे पुरी अयोध्या, जहं बैठे नृपाल! -
सुनते थे कर्ण-मधुर गायन वे अमृत-बोल!
थी कथा स्वयं की, रहे झूल आनंद-दोल!
ऋषि उठे कथा के बाद, कहा रघुपति दयालु!
ये बालक दोनों सीता के जुड़वां कृपालु!
माता इनकी कर स्मरण विरह में है निमग्न
हो जाय एक अब राजवंश, यह उचित लग्न!
साश्चर्य राम सुनते वाणी आकर्णनयन
गंभीर हुए बोले ‘‘मुनिवर! मम सुनें वचन -
यदि सीता आकर यहाँ, स्वयं ले शपथ सत्य
- लोकापवाद को सिद्ध यहाँ कर दे असत्य -
स्वीकार करूंगा उसे राजमहिषी निर्मल
ये वचन सूर्यकुल के समझो त्रयकाल अटल।’’
ऋषिवर का पा संकेत, जानकी हुई प्रकट
यह घटनाक्रम अवलोक सभा थी सन्न विकट।
नीचा मुख, मुरझाया कुड्मल, थी अश्रु-ओस
यह बार-बार की शपथ, परीक्षा, हृदय रोष -
है भरा तदपि कर जोड़, अवनि को संबोधन -
‘‘मातः! पवित्र मैं राममयी कर अनुमोदन!
मुझको ले लो निज गोद, जगत होता न सहन
दांपत्य नहीं मां! रहा मात्र नारीत्व-दहन!
तुमसे जन्मी अब समा सकूं तुममें भीतर
जग रहा तुषानल यहाँ, जली मैं तिल-तिल कर!’’
फट चली धरा, तन-मन सिहरा, पाताल दिखा
पीताभ वसन पहने सीता थी अनल-शिखा
उतरी वह मां की कोंख, नमन करके अदीन
धरती की बेटी थी, धरती में हुई लीन!!


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