आकाश के नीले स्लेट पर
परिंदों के छन्द पर लिखती है शाम
पश्चिम के ताम्र पत्र पर
दर्ज हो गया एक और दिन
रंगभूमि पर सपाट अभिनय के बाद
नेपथ्य में चला गया अभिनेता सूरज
बोर हुए दर्शकों की आखों में
आने लगी नींद की खुमारी
प्रगाढ़तर होते अंधेरे का,
चादर ओढ़कर बैठ गये
गप्प की बस्ती में चुटकुलों से घर
खपरेल से उठती धुएं की लकीर
कि भूख का फहराता परचम
था पहले यहीं कहीं मधुवन
अब तो न कहीं मधु है न वन
यह तन है बजता हुआ
स्कूल की घंटी सा टन-टन
अंधेरा पहले भी था, पर इतना गहराता नहीं था
पानी पहले भी था, पर इतना गंधलाया न था
थे पहले भी पंछी, पर नहीं थे इतने उदास
सांझ पहले भी होती रही, पर नहीं थी इतनी खामोश
यहीं कहीं तो पहले एक सीता, एक गीता थी
अब तो सभी कुछ रीता ही रीता है
पहले थे कुछ लोग, अंधेरा पीकर उजाला देने वाले
अब कौन इन अंधेरों को पीता है
यह भी तो पता नहीं चलता
कि सांझ से गिरी बस्ती में
आदमी जीता है या मरता है
परिंदों के छन्द पर लिखती है शाम
पश्चिम के ताम्र पत्र पर
दर्ज हो गया एक और दिन
रंगभूमि पर सपाट अभिनय के बाद
नेपथ्य में चला गया अभिनेता सूरज
बोर हुए दर्शकों की आखों में
आने लगी नींद की खुमारी
प्रगाढ़तर होते अंधेरे का,
चादर ओढ़कर बैठ गये
गप्प की बस्ती में चुटकुलों से घर
खपरेल से उठती धुएं की लकीर
कि भूख का फहराता परचम
था पहले यहीं कहीं मधुवन
अब तो न कहीं मधु है न वन
यह तन है बजता हुआ
स्कूल की घंटी सा टन-टन
अंधेरा पहले भी था, पर इतना गहराता नहीं था
पानी पहले भी था, पर इतना गंधलाया न था
थे पहले भी पंछी, पर नहीं थे इतने उदास
सांझ पहले भी होती रही, पर नहीं थी इतनी खामोश
यहीं कहीं तो पहले एक सीता, एक गीता थी
अब तो सभी कुछ रीता ही रीता है
पहले थे कुछ लोग, अंधेरा पीकर उजाला देने वाले
अब कौन इन अंधेरों को पीता है
यह भी तो पता नहीं चलता
कि सांझ से गिरी बस्ती में
आदमी जीता है या मरता है

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